Snow Drought in Himalaya- हिमालय में बर्फ का सूखा ! IIT और वाडिया संस्थान की चेतावनी

Snow Drought in Himalaya- ग्लोबल वार्मिंग और जलवायु परिवर्तन के चलते देवभूमि उत्तराखंड और समूचे हिंदूकुश-हिमालयी क्षेत्र पर एक बहुत बड़ा संकट मंडरा रहा है। देश के शीर्ष विज्ञानियों के ताजा अध्ययनों ने चेतावनी दी है कि हिमालय में अब बर्फ का सूखा पड़ने लगा है, सर्दियों में न सिर्फ बर्फबारी की मात्रा बेहद कम हो गई है, बल्कि जो बर्फ गिर भी रही है, वह समय से पहले तेजी से पिघल रही है, आइआइटी जम्मू और आइआइटी मंडी के संयुक्त अध्ययन के साथ-साथ देहरादून स्थित वाडिया हिमालय भूविज्ञान संस्थान की हालिया रिसर्च ने इस खौफनाक सच्चाई पर मुहर लगा दी है।

आइआइटी के विज्ञानियों ने वर्ष 1999 से 2016 तक के यानी करीब 17 सालों के सैटेलाइट और मौसम के आंकड़ों का बारीकी से विश्लेषण किया है। इस अध्ययन के मुताबिक, पहले जहां दिसंबर और जनवरी के महीनों में भारी और ठोस बर्फबारी होती थी, वहीं अब इसका पैटर्न पूरी तरह बदल चुका है। अब फरवरी, मार्च और अप्रैल के महीनों में बर्फ गिर रही है। इस देर से गिरने वाली बर्फ में पानी की मात्रा अधिक होती है, जिसके कारण यह टिकने के बजाय तुरंत पिघल जाती है। नतीजा यह है कि ग्लेशियर दोबारा रीचार्ज नहीं हो पा रहे हैं और अपना द्रव्यमान (मास) तेजी से खो रहे हैं।

Snow Drought in Himalaya- बड़े ग्लेशियरों का घट रहा बर्फ बैंक

वाडिया संस्थान के वरिष्ठ विज्ञानी डा. मनीष मेहता के अध्ययन के अनुसार, उत्तराखंड और लद्दाख के ग्लेशियर बेहद खतरनाक रफ्तार से सिकुड़ रहे हैं:

Snow Drought in Himalaya
  • गंगोत्री ग्लेशियर: भागीरथी और गंगा का यह मुख्य स्रोत पहले से ही 19 मीटर प्रति वर्ष की हैरान करने वाली रफ्तार से पीछे खिसक रहा है।
  • चौराबाड़ी ग्लेशियर (मंदाकिनी/गंगा का स्रोत): यह ग्लेशियर वर्ष 2003 से 2012 के बीच 0.7 मीटर वाटर इक्यूवेलेंट प्रति वर्ष की दर से अपनी बर्फ खो चुका है।
  • डुकरानी ग्लेशियर: इसके बर्फ समाप्त होने की दर 0.35 मीटर (1994 से 2013) मापी गई है।
  • पेंसिलुंगपा ग्लेशियर (लद्दाख): वर्ष 2015 से 2023 के बीच इस ग्लेशियर ने 8 मीटर तक अपनी मोटाई गंवाई है और यह 7 से 8 मीटर पीछे खिसक गया है।

Snow Drought in Himalaya- जोशीमठ और हिल स्टेशनों का बुरा हाल

डा. मेहता के मुताबिक, जलवायु परिवर्तन का असर अब धरातल पर साफ दिखने लगा है। करीब 15-20 साल पहले तक उत्तराखंड के जोशीमठ जैसे क्षेत्रों में सर्दियों में 4 से 5 फीट तक बर्फबारी दर्ज की जाती थी, लेकिन अब वहां एक फीट बर्फ पड़ना भी मुश्किल हो गया है। यही स्थिति राज्य के अन्य प्रमुख हिल स्टेशनों (मसूरी, नैनीताल आदि) की भी हो रही है। अगर बर्फबारी के दिनों और इसके तरीके में आ रहा यह बदलाव नहीं रुका, तो आने वाले समय में उत्तर भारत की नदियों में पानी का संकट गहरा सकता है, जो करोड़ों लोगों के जीवन के लिए बड़ा खतरा साबित होगा।

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