Uttarakhand Tea Farming- पलायन की मार और बंजर होते खेतों से जूझ रहे उत्तराखंड के पर्वतीय क्षेत्रों के लिए रुद्रप्रयाग जिले के जखोली ब्लॉक से एक बेहद खूबसूरत और उम्मीद जगाने वाली तस्वीर सामने आई है। जिस जमीन पर कभी कांटेदार झाड़ियां और सन्नाटा पसरा हुआ था, आज वहां चाय की मखमली हरियाली की चादर बिछ चुकी है। उत्तराखंड चाय विकास बोर्ड की एक बेहतरीन मुहिम ने न सिर्फ सूने पड़ चुके गांवों में रौनक लौटा दी है, बल्कि इसे पहाड़ों में आजीविका और महिला सशक्तिकरण का एक सशक्त मॉडल भी बना दिया है।
Uttarakhand Tea Farming- सालाना 7,000 किलो का उत्पादन
चाय विकास बोर्ड ने जखोली ब्लॉक के अंतर्गत ललूड़ी, पूजारगांव, कंपनियां, पोंठी, चौरा और लौंगा जैसे आधा दर्जन गांवों को चिन्हित कर करीब 70 हेक्टेयर (लगभग 350 नाली) से अधिक भूमि पर अत्याधुनिक चाय के बागान विकसित किए हैं।
बोर्ड के फील्ड पर्यवेक्षक कुशाल सिंह रावत ने बताया कि इन बागानों के रखरखाव और पत्तियां तोड़ने के काम में स्थानीय स्तर पर करीब 350 महिलाओं को सीधा रोजगार मिला है। वर्तमान में इन बागानों से सालाना लगभग सात हजार किलोग्राम उच्च गुणवत्ता वाली हरी चायपत्ती का उत्पादन हो रहा है, जिसकी बाजार में अच्छी मांग है।

इस परियोजना की सबसे बड़ी खूबसूरती यह है कि इसने ग्रामीण महिलाओं को आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर बना दिया है।
- बढ़ी पारिवारिक आय: कंपनियां गांव की रहने वाली संतोषी देवी बताती हैं कि जो खेत बरसों से खाली पड़े थे, अब वे उनके परिवार की आय का मुख्य जरिया बन चुके हैं।
- घर के पास रोजगार: वहीं गुड्डी देवी का कहना है कि गांव में ही नियमित काम मिलने से उन्हें बाहर नहीं भटकना पड़ता। चाय बागानों से महिलाओं को हर महीने करीब 10 हजार रुपये की निश्चित आमदनी हो रही है, जिससे वे अपने बच्चों की शिक्षा और घर का खर्च आसानी से चला पा रही हैं।
Uttarakhand Tea Farming- भविष्य की बड़ी उम्मीद
Uttarakhand Tea Farming- स्थानीय ग्रामीणों, जिनमें पांखु देवी और बबिता देवी शामिल हैं, का दृढ़ विश्वास है कि यदि सरकार इस क्षेत्र में चाय उत्पादन और प्रसंस्करण (Processing) को और अधिक बढ़ावा देती है, तो पहाड़ों से हो रहे पलायन की रफ्तार को काफी हद तक धीमा किया जा सकता है। इससे स्थानीय युवाओं को भी अपने ही गांव में रोजगार के नए अवसर मिलेंगे।
“चाय की खेती पर्वतीय क्षेत्रों की भौगोलिक परिस्थितियों के अनुकूल आजीविका का सबसे मजबूत और टिकाऊ विकल्प बन सकती है। चाय के पौधों की खासियत यह होती है कि बागानों की उम्र बढ़ने के साथ-साथ पत्तों की गुणवत्ता और उत्पादन की मात्रा में और अधिक वृद्धि होती है। आने वाले वर्षों में यह क्षेत्र उत्तराखंड के प्रमुख टी-टूरिज्म हब के रूप में भी उभर सकता है।”- उद्यान विशेषज्ञ डॉ. राजेंद्र प्रसाद कुकसाल
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