Uttarakhand Janganana- उत्तराखंड के पहाड़ों में इन दिनों जनगणना का पहला चरण केवल आंकड़ों का काम नहीं रह गया है, बल्कि यह गांवों की बदलती तस्वीरों को भी सामने ला रहा है। कहीं बंद पड़े घर और सुनसान बस्तियां पलायन की कहानी कह रही हैं, तो कहीं आबाद गांवों में खुशहाली और विकास की झलक दिखाई दे रही है, दुर्गम पहाड़ी रास्तों को पार कर प्रगणक घर-घर पहुंच रहे हैं ताकि कोई भी परिवार गणना से छूट न जाए।
प्रदेशभर में मकान सूचीकरण और मकान गणना का कार्य अंतिम चरण में पहुंच चुका है। 24 मई तक सभी जिलों में मकानों की गणना पूरी कर ली जाएगी। पर्वतीय क्षेत्रों, दूरस्थ गांवों और सीमांत इलाकों में भी प्रगणक लगातार कार्य कर रहे हैं। कई स्थानों पर उन्हें घंटों पैदल चलकर गांवों तक पहुंचना पड़ रहा है, जबकि खराब मौसम और कठिन भौगोलिक परिस्थितियां भी चुनौती बनी हुई हैं।
जनगणना अभियान के दौरान प्रगणकों को पहाड़ के गांवों की अलग-अलग तस्वीरें देखने को मिल रही हैं। कुछ गांवों में बड़ी संख्या में मकान खाली पड़े मिले, जहां पलायन का असर साफ नजर आया। वहीं कई गांव ऐसे भी मिले जहां लोग खेती, बागवानी और स्थानीय रोजगार से जुड़े हुए हैं और गांवों में रौनक बनी हुई है।
राज्य सरकार और जनगणना विभाग इस अभियान को पूरी गंभीरता से संचालित कर रहे हैं। मकानों की गणना के साथ-साथ परिवारों से जुड़ी मूलभूत जानकारियां भी जुटाई जा रही हैं, ताकि भविष्य की योजनाओं को बेहतर ढंग से तैयार किया जा सके। अधिकारियों का कहना है कि इस डेटा का उपयोग ग्रामीण विकास, बुनियादी सुविधाओं और जनकल्याण योजनाओं के लिए महत्वपूर्ण साबित होगा।

जनगणना निदेशक इवा आशीष श्रीवास्तव ने बताया कि पिछले तीन दिनों में डेटा अपलोडिंग की रफ्तार तेज हुई है और अब लक्ष्य की ओर तेजी से बढ़ा जा रहा है। उन्होंने कहा कि सभी प्रगणक कठिन परिस्थितियों में भी पूरी जिम्मेदारी के साथ कार्य कर रहे हैं। नागरिकों से अपील की गई है कि वे सही जानकारी देकर प्रगणकों का सहयोग करें ताकि यह राष्ट्रीय अभियान सफलतापूर्वक पूरा हो सके।
Uttarakhand Janganana- विशेषज्ञों का मानना है कि जनगणना के दौरान सामने आ रही तस्वीरें उत्तराखंड के सामाजिक और आर्थिक बदलावों का महत्वपूर्ण दस्तावेज बनेंगी। खासकर पर्वतीय क्षेत्रों में पलायन, रोजगार और ग्रामीण जीवन की वास्तविक स्थिति को समझने में यह आंकड़े अहम भूमिका निभाएंगे।