Jauljibi Mela- भारत-नेपाल सीमा पर प्रकृति की गोद में बसी काली और गोरी नदियों के पवित्र संगम पर लगने वाला ऐतिहासिक अंतरराष्ट्रीय जौलजीबी मेला इस वर्ष अपनी 112 वर्ष की गौरवशाली विरासत के साथ एक बार फिर सजने के लिए तैयार है। सीमांत क्षेत्र की व्यापारिक, सांस्कृतिक और सामाजिक पहचान बन चुका यह मेला इस बार एक खास वजह से पूरे क्षेत्र में चर्चा का केंद्र बना हुआ है। छह साल के लंबे अंतराल के बाद इस बार मेले में एक बार फिर तिब्बती उत्पादों की दुकानें नजर आने की प्रबल उम्मीद है।
साल 2019 से भारत-चीन सीमांत व्यापार बंद होने के कारण तिब्बत से आने वाले सामान की आपूर्ति पूरी तरह प्रभावित हो गई थी, जिससे मेले का पारंपरिक बाजार फीका पड़ गया था। लेकिन इस बार तिब्बती प्रोडक्ट्स की संभावित वापसी से मेले के पारंपरिक बाजार में पुरानी रौनक लौटने की उम्मीद जताई जा रही है। ऊनी कपड़े, गर्म जैकेट, मफलर, कंबल और अन्य पारंपरिक वस्तुएं हमेशा से इस मेले के प्रमुख आकर्षण रहे हैं, जिनकी मांग स्थानीय लोगों के साथ-साथ दूरदराज से आने वाले पर्यटकों में भी काफी रहती है।
Jauljibi Mela- 1914 में हुई थी मेले की शुरुआत
Jauljibi Mela- जौलजीबी मेले का इतिहास एक सदी से भी अधिक पुराना है। इसकी शुरुआत वर्ष 1914 में अस्कोट के पाल राजा गजेंद्र बहादुर पाल ने की थी। उस समय पहाड़ी इलाकों में आवागमन के साधन बेहद सीमित थे। कपड़े, बर्तन और रोजमर्रा की जरूरतों का सामान खरीदने के लिए लोगों को लंबी दूरी तय कर अल्मोड़ा या टनकपुर तक पैदल जाना पड़ता था। जनता की इसी कठिनाई को दूर करने और क्षेत्र में व्यापार को बढ़ावा देने के उद्देश्य से इस मेले की नींव रखी गई थी।
समय के साथ इस मेले को बड़े व्यापारिक केंद्र के रूप में विकसित किया गया, जिसमें आगरा, मथुरा, बरेली, दिल्ली, रामपुर, मुरादाबाद, मेरठ, काशीपुर, रामनगर, अल्मोड़ा, हल्द्वानी और टनकपुर जैसे बड़े शहरों के व्यापारी हिस्सा लेने लगे। धीरे-धीरे नेपाल और तिब्बत के व्यापारियों के जुड़ने से इसे अंतरराष्ट्रीय पहचान मिली।
वर्ष 1962 के भारत-चीन युद्ध के बाद तिब्बती व्यापारियों की प्रत्यक्ष भागीदारी समाप्त हो गई थी, जिससे मेले के अंतरराष्ट्रीय स्वरूप को धक्का लगा। हालांकि, वर्ष 1992 में भारत-चीन सीमांत व्यापार दोबारा शुरू होने के बाद भारतीय व्यापारी लिपुलेख दर्रे के रास्ते तिब्बत से उत्पाद लाकर जौलजीबी मेले में बेचने लगे थे। यह सिलसिला 2019 तक चला, लेकिन व्यापार बंद होने से फिर व्यवधान आ गया। अब छह साल बाद इन उत्पादों की वापसी की उम्मीद ने व्यापारियों और खरीददारों में भारी उत्सुकता बढ़ा दी है।
Jauljibi Mela- संस्कृति और रोजगार का संगम
Jauljibi Mela- जौलजीबी मेला केवल खरीददारी का केंद्र नहीं है, बल्कि यह भारत और नेपाल के सीमांत समाज के बीच आपसी मेलजोल और सांस्कृतिक आदान-प्रदान का बड़ा माध्यम भी है। व्यापार संघ जौलजीबी के अध्यक्ष धीरेंद्र धर्म सूक्त ने बताया कि मेले की तैयारियां शुरू कर दी गई हैं और इस वर्ष 400 से अधिक व्यापारियों के पहुंचने का अनुमान है।
धारचूला के एसडीएम आशीष जोशी ने जानकारी दी कि 14 नवंबर से शुरू होने वाले इस मेले में भव्य सांस्कृतिक कार्यक्रमों का आयोजन किया जाएगा और आने वाले सभी व्यापारियों को स्थानीय स्तर पर आवश्यक सुविधाएँ उपलब्ध कराई जाएंगी।
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