Narayani Shila Haridwar
Narayani Shila Haridwar- सनातन परंपरा में पितरों के प्रति कृतज्ञता और श्रद्धा प्रकट करने का महापर्व पितृ पक्ष श्रद्धा और भक्ति भाव के साथ मनाया जा रहा है। तीर्थ नगरी हरिद्वार के गंगा तटों और प्रमुख देवस्थानों पर अपने पूर्वजों के तर्पण एवं पिंडदान के लिए श्रद्धालुओं की भारी हलचल दिखाई दे रही है। शास्त्रों में विधान है कि श्रद्धा भाव से किए गए कर्म को ही ‘श्राद्ध’ कहा जाता है, जिससे भटकती आत्माओं और पितरों को परम शांति प्राप्त होती है। स्कंद पुराण, वायु पुराण और गरुड़ पुराण जैसे ग्रंथों के अनुसार, पितृ मुक्ति के तीन प्रमुख तीर्थों में हरिद्वार की नारायणी शिला का माहात्म्य अत्यंत दुर्लभ और पावन माना गया है। पौराणिक आख्यानों के अनुसार:
- गया धाम: भगवान श्रीहरि विष्णु के पवित्र चरण कमल विराजमान हैं।
- बद्रीनाथ धाम: श्रीहरि का ललाट (मस्तक) क्षेत्र माना जाता है।
- हरिद्वार नारायणी शिला: भगवान विष्णु के कंठ से लेकर नाभि तक का पवित्र वक्ष स्थल माना गया है।
यही कारण है कि पितृ पक्ष के 16 दिनों की अवधि में नारायणी शिला पर अर्पित किया गया जल, तिल और पिंडदान का अंश सीधे श्रीहरि विष्णु के हृदय तक पहुंचता है।
Narayani Shila Haridwar- 100 मातृ कुल की मुक्ति का विधान
Narayani Shila Haridwar- धर्मशास्त्रों के ज्ञाताओं और पंडित मनोज त्रिपाठी के अनुसार, महालय पक्ष में जो भी जातक निष्ठा, पवित्रता और विधि-विधान के साथ नारायणी शिला पर अपने पूर्वजों का श्राद्ध कर्म संपन्न करता है, उसके पितृ पक्ष की 100 पीढ़ियां और मातृ पक्ष की भी 100 पीढ़ियां सर्वथा पितृ दोष से मुक्त हो जाती हैं। इस प्राचीन शिला पर पिंडदान करने से न केवल 200 कुलों के पूर्वजों को तृप्ति, शांति और मोक्ष प्राप्त होता है, बल्कि श्राद्ध करने वाले वंशजों को भी अपने जीवनकाल में सुख, समृद्धि और अंत समय में मोक्ष का अक्षय आशीर्वाद प्राप्त होता है। यह भी पढ़ें…
