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Pandav Nritya- बदरी-केदार भूमि से जुड़ी पांडवों की गाथा, नृत्य में जीवंत

Pandav Nritya- उत्तराखंड के पर्वतीय अंचलों में लोकनृत्यों की समृद्ध परंपरा है लेकिन इनमें पांडव (पंडौं) नृत्य का स्थान सबसे विशिष्ट और श्रद्धा से जुड़ा हुआ है, यह नृत्य केवल एक सांस्कृतिक प्रस्तुति नहीं, बल्कि गढ़वाल की लोकआस्था, पौराणिक स्मृतियों और सामाजिक जीवन का जीवंत प्रतीक है, पांडवों का गढ़वाल से गहरा और ऐतिहासिक संबंध माना जाता है, महाभारत युद्ध से पहले और युद्ध समाप्ति के बाद पांडवों ने गढ़वाल की भूमि पर लंबा समय व्यतीत किया था।

पौराणिक मान्यताओं के अनुसार लाखामंडल में दुर्योधन ने माता कुंती समेत पांडवों को जीवित जलाने के उद्देश्य से लाक्षागृह का निर्माण कराया था। वहीं, महाभारत युद्ध के उपरांत कुल, गोत्र और ब्रह्म हत्या के पाप से मुक्ति के लिए महर्षि वेदव्यास ने पांडवों को शिव की शरण में जाने की सलाह दी, जिसके बाद वे केदारभूमि पहुंचे। मान्यता है कि केदारनाथ में पांडवों ने महिष रूपी भगवान शिव के पृष्ठभाग की पूजा कर बाबा केदार की प्रतिष्ठा की। इसी क्रम में मध्यमेश्वर, तुंगनाथ, रुद्रनाथ और कल्पेश्वर में भी भगवान शिव की आराधना की गई।

इसके बाद पांडव द्रौपदी के साथ बदरीनाथ होते हुए स्वर्गारोहिणी की ओर प्रस्थान कर गए। लोकमान्यता के अनुसार युधिष्ठिर ही सशरीर स्वर्ग पहुंचे, जबकि अन्य पांडवों और द्रौपदी ने भीम पुल, लक्ष्मी वन, सहस्त्रधारा, चक्रतीर्थ और संतोपंथ जैसे स्थानों पर शरीर का त्याग किया। बदरी-केदार भूमि के प्रति पांडवों के इसी अलौकिक प्रेम ने उन्हें गढ़वाल का लोकदेवता बना दिया।

Pandav Nritya- इसी कारण शीतकाल के महीनों में गढ़वाल क्षेत्र में पांडव नृत्य का व्यापक आयोजन होता है। रुद्रप्रयाग जिले के तल्ला नागपुर क्षेत्र में पांडव नृत्य का सबसे विविध और भव्य आयोजन देखने को मिलता है। हर वर्ष नवंबर-दिसंबर के बीच यह पूरा क्षेत्र पांडवमय हो जाता है। इसके अलावा देहरादून जिले के जनजातीय क्षेत्र जौनसार-बावर में भी पांडव नृत्य एक प्रमुख धार्मिक अनुष्ठान के रूप में आयोजित किया जाता है।

नवंबर-दिसंबर में खेती-बाड़ी के कार्य पूरे हो जाने के बाद ग्रामीणजन पांडव नृत्य में पूरे उत्साह से भाग लेते हैं। गांव की खुशहाली, अच्छी फसल और सामूहिक सुख-समृद्धि की कामना के साथ इस अनुष्ठान का आयोजन किया जाता है। पांडव नृत्य पहाड़वासियों के लिए केवल परंपरा नहीं, बल्कि पारिवारिक और सामाजिक पुनर्मिलन का अवसर भी है। इस दौरान प्रवासी लोग गांव लौटते हैं, वर्षों से बंद पड़े घरों के ताले खुलते हैं और ब्याहता बेटियां (धियाण) भी मायके पहुंचती हैं।

पांडव नृत्य के आयोजन से पूर्व गांव के पांडव चौक (पंडौं चौरा) में इसकी रूपरेखा तय की जाती है। यही वह स्थल होता है, जहां नृत्य संपन्न होता है। उत्तराखंड के पारंपरिक लोकवाद्य ढोल-दमाऊ इस नृत्य के प्राण माने जाते हैं। मान्यता है कि इनमें अलौकिक शक्तियां निहित होती हैं। जैसे ही ढोली (औजी या दास) ढोल पर विशेष ताल बजाता है, नृत्य में पांडवों की भूमिका निभाने वाले व्यक्तियों पर पांडवों का अवतरण हो जाता है। इन्हें पांडव पश्वा कहा जाता है।

Pandav Nritya- पांडव पश्वाओं का चयन किसी द्वारा तय नहीं किया जाता। वे ढोल की विशिष्ट नौबत पर स्वयं अवतरित होते हैं। युधिष्ठिर, भीम, अर्जुन, नकुल, सहदेव और द्रौपदी के अवतरण के लिए अलग-अलग ताल होती है। लोकमान्यता के अनुसार पांडव उन्हीं परिवारों में अवतरित होते हैं, जिनमें पूर्व में भी उनका अवतरण होता रहा है। पांडव पश्वाओं के अवतरण की प्रक्रिया रहस्यमयी मानी जाती है और इस पर आज भी शोध कार्य जारी हैं।

पांडव नृत्य में कुल 13 पश्वा होते हैं, जिनमें कुंती, द्रौपदी, भगवान नारायण, युधिष्ठिर, भीम, अर्जुन, नकुल, सहदेव, हनुमान, अग्निवाण, मालाफुलारी, भवरिक और कल्या लुहार शामिल हैं। नृत्य के दौरान बाण निकालने का दिन, धार्मिक स्नान, मोरु डाळी, मालाफुलारी, चक्रव्यूह, कमल व्यूह और गरुड़ व्यूह जैसे अनुष्ठान संपन्न होते हैं।

गढ़वाल की यमुना घाटी में कई स्थल पांडवों और कौरवों से जुड़े हुए हैं, जिनमें लाखामंडल प्रमुख है। कहा जाता है कि यहां पांडव लाक्षागृह से निकलकर गुफाओं में लंबे समय तक रहे थे। आज भी यहां सैकड़ों गुफाएं मौजूद हैं। जौनसार क्षेत्र में हर वर्ष पांडव लीला और नृत्य का आयोजन श्रद्धा और भक्ति के साथ किया जाता है।

Pandav Nritya- पांडव नृत्य कोई साधारण नृत्य नहीं, बल्कि नृत्य, गीत और नाट्य का संयुक्त रूप है। इसमें ढोल की भूमिका सबसे अहम होती है। ढोली और उनके सहयोगी संवाद और गायन के माध्यम से पांडवों की जीवनशैली, खान-पान, हास्य-व्यंग्य, युद्ध कौशल, कृषि और संघर्षों को मंच पर जीवंत करते हैं। इसमें जहां हास्य और लोकव्यंग्य होता है, वहीं पांडवों के कठिन जीवन और रोष-क्षोभ की अभिव्यक्ति भी दिखाई देती है।

इस संपूर्ण आयोजन का संचालन गांव के ढोली के जिम्मे होता है, जिन्हें महाभारत की कथाओं का जीवंत ज्ञाता माना जाता है। उनके गीत और संवाद पांडव नृत्य में प्राण फूंक देते हैं। बीच-बीच में गांव के बुजुर्ग भी लयबद्ध वार्ताओं और गायन के जरिए इसमें सहभागिता करते हैं। खास बात यह है कि पांडव नृत्य के लिए कोई पूर्व निर्धारित स्क्रिप्ट नहीं होती, बल्कि यह परंपरा, स्मृति और सामूहिक चेतना से स्वतः प्रवाहित होता है।

Pandav Nritya- पांडव नृत्य आज भी गढ़वाल की लोकसंस्कृति, आस्था और सामाजिक एकता का अनमोल दस्तावेज है, जो पीढ़ी दर पीढ़ी इस पर्वतीय समाज की आत्मा को जीवित रखे हुए है।

 

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