Satu-Aathu- उत्तराखंड के कुमाऊं क्षेत्र में परंपराओं की महक फिर से बिखरने लगी है। भाद्रपद माह की सप्तमी और अष्टमी तिथि पर मनाया जाने वाला लोकपर्व सातूं‑आठूं अब विधिवत रूप से शुरू हो चुका है। गांव-गांव में महिलाएं पारंपरिक वेशभूषा में सजकर पूजन-अनुष्ठानों में जुटी हुई हैं और लोकगीतों की गूंज से पहाड़ की वादियां फिर से जीवंत हो उठी हैं।
Satu-Aathu- बिरुड़ पंचमी से हुई शुरुआत
इस पर्व की शुरुआत बिरुड़ पंचमी से होती है। इस दिन महिलाएं गेहूं, मक्का, चना, गहत, मटर जैसे अनाजों को दूब (एक प्रकार की पवित्र घास) के साथ तांबे के पात्र में भिगोती हैं। इन्हीं अनाजों को ‘बिरुड़’ कहा जाता है। यह परंपरा देवताओं को अर्पण हेतु प्रसाद तैयार करने की धार्मिक मान्यता से जुड़ी है।
सप्तमी (सातूं): देवी गौरा की पूजा
सप्तमी तिथि को, महिलाएं व्रत रखती हैं और नदी या नौले (प्राकृतिक जल स्रोत) पर जाकर इन अनाजों को धोती हैं। इसके बाद धान या सौं के पौधों से देवी गौरा (पार्वती) की प्रतिमा तैयार की जाती है। महिलाएं पारंपरिक श्रृंगार कर पूजा करती हैं और हाथों में पीली डोर (डोर बांधना) भी बांधी जाती है, जिसे सुहाग की रक्षा का प्रतीक माना जाता है।

अष्टमी (आठूं): महेश का पूजन और लोकउत्सव
अष्टमी के दिन भगवान शिव (महेश) की प्रतिमा बनाई जाती है और फिर गौरा–महेश का पूजन एक साथ किया जाता है। इस दिन महिलाएं गले में ‘दुबड़ा’ (लाल धागा) पहनती हैं और देवी-देवताओं की कथा सुनती हैं। साथ ही वे लोकगीतों, झोड़ा-चांचरी और नृत्य के माध्यम से पर्व का उल्लास साझा करती हैं। कई स्थानों पर रात भर जागरण का आयोजन भी होता है।
Satu-Aathu- बेटी-जीजा के रिश्ते की सांस्कृतिक अभिव्यक्ति
इस पर्व में देवी गौरा को ‘दीदी’ और भगवान महेश को ‘जीजाजी’ के रूप में मान्यता दी जाती है। यह पर्व एक धार्मिक अनुष्ठान के साथ-साथ सामाजिक और पारिवारिक संबंधों की भावनात्मक अभिव्यक्ति भी है। पर्व के समापन पर प्रतिमाओं का जल में विसर्जन किया जाता है, जिसे ‘गौरा की विदाई’ कहा जाता है।

Satu-Aathu- मौसम की चुनौतियों के बावजूद जोश बरकरार
हालांकि इस बार वर्षा और जलवायु परिवर्तन के चलते ‘सौं घास’ और पारंपरिक फूलों की उपलब्धता कम रही है, फिर भी ग्रामीणों ने लोकसामग्री से ही देवी-देवताओं की प्रतिमाएं बनाकर परंपरा निभाई। ग्रामीण अंचलों में छोटे-छोटे समूहों में गीतों और भजन-कीर्तन की गूंज लगातार सुनाई दे रही है।
Satu-Aathu- पर्व के चरण
| पर्व चरण | विशेषताएं |
|---|---|
| बिरुड़ पंचमी | अनाजों को भिगोकर पूजन प्रारंभ |
| सप्तमी (सातूं) | गौरा प्रतिमा निर्माण, व्रत और डोर बांधना |
| अष्टमी (आठूं) | महेश प्रतिमा पूजन, दुबड़ा धारण और लोकगीत |
| समापन | विसर्जन और ‘गौरा दीदी’ की विदाई |