Ancient Architecture Uttarakhand- हिमालयी क्षेत्रों में आपदाओं से सुरक्षित और टिकाऊ निर्माण के लिए प्राचीन स्थापत्य शैली आज भी उदाहरण बनी हुई है। केदारनाथ मंदिर इसका सबसे बड़ा प्रमाण है, जो विनाशकारी बाढ़ के बावजूद अडिग खड़ा है। विशेषज्ञों का मानना है कि मजबूत और संतुलित निर्माण के लिए स्थापत्य शैली, टिकाऊ सामग्री और लचीली तकनीक का समावेश जरूरी है।
जीबी पंत अभियांत्रिकी एवं प्रौद्योगिकी संस्थान घुड़दौड़ी के सिविल इंजीनियरिंग विभाग के डॉ. सरीष चंद्रवंशी बताते हैं कि प्राचीन दौर में निर्माण का दबाव भूमि की वहन क्षमता से अधिक नहीं होता था। घर छोटे आकार के होते और उनके बीच पर्याप्त दूरी छोड़ी जाती थी।
Ancient Architecture Uttarakhand- प्राचीन निर्माण की विशेषताएं
- स्थापत्य शैली: नागर, द्रविड़, वेसर और नवदुर्गा जैसी शैलियां संतुलन और मजबूती का बेहतरीन उदाहरण थीं।
- निर्माण सामग्री: ग्रेनाइट, बलुआ पत्थर, संगमरमर और चुना-गारा समय के साथ और मजबूत होते गए। हिमालयी क्षेत्रों में दीमक व आर्द्रता-प्रतिरोधी लकड़ी का प्रयोग होता था।
- तकनीक: पत्थरों को बिना सीमेंट के इंटरलॉक कर जोड़ा जाता था, जिससे भूकंप में संरचनाएं लचीली होकर भी सुरक्षित रहती थीं।
- डिजाइन संतुलन: गुंबद और मंडप इस तरह बनाए जाते थे कि पूरी इमारत केंद्र-सरेखण के साथ संतुलित रहे।
- स्थान का चयन: भूगर्भीय अध्ययन, मिट्टी की जांच, जलस्रोत और पर्यावरणीय कारकों को ध्यान में रखकर स्थान तय किया जाता था।
Ancient Architecture Uttarakhand- वर्तमान में बहुमंजिला इमारतें और कंक्रीट का अत्यधिक उपयोग पहाड़ों की ढीली मिट्टी पर दबाव बढ़ा रहा है। ऐसे में विशेषज्ञ मानते हैं कि यदि आधुनिक तकनीक के साथ प्राचीन स्थापत्य सिद्धांतों को जोड़ा जाए तो हिमालयी क्षेत्रों में आपदा-सुरक्षित और टिकाऊ निर्माण संभव हो सकता है।